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Applauses Captured!

In each of us is hidden a Story teller, one who loves to open up new windows to the world, looks up beyond the horizons and dreams in the day just to mar a virgin sheet of paper with a fantastic fable. Tumbhi came up with a Short Story Writing Contest called “Somewhere Sometime” to catch hold of such beautiful birds of imagination with only one string of condition attached, i.e. the story was required to have a twist.

 

 

Each entry was individually analyzed by the jury which comprised of Kiran Khalap (author, Brand Consultant and founder of Chlorophyll Brand & Communications Consultancy); Javed Siddiqui (urdu and hindi screenwriter, dialogue writer and playwright form India, he has written over 50 storylines, screenplays and dialogues which comprises of films like DDLJ, Umraao Jaan, Taal, Pardes, Raja Hindustani and many more); and Pankaj Shukla (a film critic, a senior journalist, a book reviewer, writer, director, and a keen traveler).

Beautiful captures of visionary pieces were tracked and judges could only give some to-be-remembered-forever remarks on the entries.

The entries were judged on the basis of 4 criteria: Plot, Narrative, Language and Twist .They were looking for a perfect balance of idea and execution along with the compulsory flawless of the language used.

Although the expectations made are seldom defeated, the jury was able to make some concrete remarkes on the quality of the entries that poured in .

Following the criteria trail, the remarks are as under:

Plot: Basically considered as the idea of the story, the plan wherein all the events of the story fall in certain sequence. Some of the entries were quite surprising with their plots with good build ups and imagery. The feel was remarkable at some reading points. Some stories also came up with slight moral reflection and subtle humor which was highly admired
Narrative: what the reader sees and hears of what happens – and how he sees and hears it. The Hindi entries were almost flawless in their narration. Although a much higher level of good narrative by the use of quality dialogues was expected which was missing.
Language: The words weaving and unfolding the events in the story need to be carefully chosen in terms of their tone and elegancy. A couple of the English ones were quite poor in their use of language with the extensive usage of sms language and not-so-decent words although the Hindi stories stil scored some decent points in this respect.
Twist-in-the-tale: The surprise element in the story which changes the course of the events and takes it to a new climax, something which is not predictable by the reader. Many of the writers used GHOSTS as the only object of Twist which was kind of predictable. The twists could have been much twistier with more element of surprise in it. Because ofcourse there could be many more surprising things than ghosts alone 🙂

Tumbhi team expects the writers who participated and got a chance to run their artworks under such veterans of the writing world will surely benefit from such valuable feedback!!

संकेत पानसिंह तोमर और कहानी के ..

सार्थक सिनेमा, समानांतर सिनेमा और इतर सिनेमा के बाद हिंदी सिनेमा में इन दिनों एक नया सिनेमा धीरे धीरे शक्ल लेने लगा है। ये है जमीनी सिनेमा। जी हां, वो सिनेमा जो हिंदुस्तान की जमीन से अपनी खुराक पाता है। हमारे आपके बीच से कहानियां उठाता है और उसे बिना किसी दिखावे या लाग लपेट के ज्यों का त्यों परदे पर परोस देता है। पान सिंह तोमर और कहानी की कामयाबी के बहाने तुमभी.कॉम के सलाहकार व वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ल की इस नए जमीनी सिनेमा के चलन पर एक टिप्पणी।

 

“लोग अब सितारों से ज्यादा कहानियों पर ध्यान देने लगे हैं। विद्या बालन की फिल्मों ने दर्शकों के सोचने के नजरिए में इस तरह का बदलाव लाने में बड़ी भूमिका निभाई है।”-बिपाशा बसु

“अब 14-15 साल का बच्चा भी फिल्मों की कहानियों की चोरी या संगीत की धुनों की चोरी पकड़ सकता है। ऐसे में जरूरी हो गया है कि हम अपनी तरह की फिल्में बनाएं।”-विनय तिवारी

साल की शुरूआत में प्लेयर्स जैसी मल्टीस्टारर फिल्म को मिली नाकामयाबी और इधर पहले पान सिंह तोमर और फिर कहानी को दर्शकों से मिली वाहवाही से एक बात का संकेत साफ मिलता है और वो ये कि दर्शक अब मसाला फिल्मों के निर्माताओं के मायाजाल से निकलने को छटपटा रहे हैं। जमीन से जुड़ी कहानियों को मिल रहे अच्छे प्रतिसाद ने उन निर्माता निर्देशकों के भी हौसले बुलंद किए हैं जो बजाय विदेशी फिल्मों की नकल करने की बजाय अपने आसपास की कहानियों को परदे पर उतारने की परंपरा का पालन करते रहे हैं। पान सिंह तोमर और कहानी की कामयाबी का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि भले विद्या बालन ने इस फिल्म के प्रचार के लिए एक गर्भवती महिला का स्वांग भरकर जबर्दस्त प्रचार किया हो लेकिन इस फिल्म के प्रचार में एक भी अभिनेता ने हिस्सा नहीं लिया। वहीं, पान सिंह तोमर के प्रचार के लिए इन दिनों फैशन बन चुके सिटी टूर तक नहीं हुए। इरफान चुपचाप अपनी पंजाबी फिल्म किस्सा की शूटिंग करते रहे और एक अच्छी फिल्म के बारे में लोगों को बताने का जिम्मा टि्वटर और फेसबुक पर मौजूद इरफान के प्रशंसकों ने संभाल लिया। दोनों फिल्मों की अच्छाइयां बताने के लिए सोशन नेटवर्किंग साइट्स पर एक अभियान सा छिड़ा दिखा और इन दोनों फिल्मों को हिंदी सिनेमा में कथानक की वापसी और स्टार सिस्टम की विदाई के तौर पर भी लोग देखने लगे हैं

पिछले दो तीन साल से जिस तरह धुआंधार प्रचार करके दबंग, रेडी और रा वन जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस से करोड़ों रुपये बटोरे हैं, उसके चलते दर्शकों को भी अब समझ में आने लगा है कि हर वो फिल्म जिसके प्रचार के लिए सितारे शहर शहर घूमे, वो अच्छी ही हो ये जरूरी नहीं। काठ की हांडी के एक बार ही आग पर चढ़ पाने की बात लोगों को पता थी लेकिन इसके बावजूद बीते चंद महीनों में दर्शकों को यूं छलने का क्रम जारी रहा। ट्रेड मैगजीन सुपर सिनेमा के संपादक विकास मोहन कहते हैं, प्रचार करने के परंपरागत तरीकों में जोर फिल्म की कहानी का खुलासा करने के साथ साथ इसकी यूएसपी बताने पर रहा करता था। लेकिन, मौजूदा दौर में प्रचार के दौरान फिल्म के बारे में बातें कम होती हैं, और तमाम दूसरी चीजों के जरिए फिल्म के बारे में उत्सुकता जगाने पर फिल्म निर्माताओं की मेहनत ज्यादा होती है। इस फॉर्मूले ने कुछेक औसत से हल्की फिल्मों के लिए काम भी किया, पर अब दर्शक भी उपभोक्ता की तरह सोचने लगा है। उसे बार बार बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता।

फिल्म प्लेयर्स में मुख्य नायिका रहीं बिपाशा बसु भी विकास मोहन की बात से सहमत नजर आती हैं। वह कहती हैं, मुझे ये मानने में कतई गुरेज नहीं कि प्लेयर्स पूरी तरह फ्लॉप रही। हिंदी सिनेमा में एक बार फिर जमाना वर्ड ऑफ माउथ पब्लिसिटी का लौट आया है यानी फिल्म देखकर निकलने वाले दर्शक अगर फिल्म के बारे में अच्छी बातें करते हैं तभी इसका फायदा फिल्म को मिलता है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के चलते इसकी अहमियत और भी ज्यादा बढ़ गई है। अब तो हर दर्शक फिल्म समीक्षक हो गया है, वह फिल्म देखकर निकलने के साथ ही उसके बारे में फेसबुक या टि्वटर पर टिप्पणी कर देता है और इसका असर होता है। इसका सार्थक पहलू ये है कि लोग अब सितारों से ज्यादा कहानियों पर ध्यान देने लगे हैं। विद्या बालन की फिल्मों ने दर्शकों के सोचने के नजरिए में इस तरह का बदलाव लाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

 

तो क्या पान सिंह तोमर और कहानी जैसी फिल्मों की कामयाबी की वजह से दर्शकों को अब बड़े परदे पर और भी लीक से इतर कहानियों पर बनी फिल्में देखने को मिलेंगी? जवाब देते हैं फिल्म निर्माता विनय तिवारी। वह कहते हैं, हिंदी सिनेमा को विदेशी सिनेमा की नकल करने की बहुत बुरी बीमारी लगी रही है। इंटरनेट और सैटेलाइट टेलीविजन से ही इस कैंसर का इलाज मुमकिन था और ये अब हो भी रहा है। अब 14-15 साल का बच्चा भी फिल्मों की कहानियों की चोरी या संगीत की धुनों की चोरी पकड़ सकता है। ऐसे में जरूरी हो गया है कि हम अपनी तरह की फिल्में बनाएं। भारतीय सिनेमा को विदेशों में पहचान मदर इंडिया जैसी फिल्मों से ही मिली है और हिंदी साहित्य में ऐसा बहुत कुछ लिखा गया है जिस पर अच्छी हिंदी फिल्में बन सकती हैं। हमने साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर फिल्म बनाने का फैसला इसी क्रम में लिया। और, मुझे खुशी इस बात की सबसे ज्यादा है कि सनी देओल जैसे बड़े सितारे भी अब इस बात को समझ रहे हैं और इस तरह के प्रयासों का समर्थन करने के लिए आगे आ रहे हैं।

निर्माता विनय तिवारी की फिल्म मोहल्ला अस्सी को लेकर फिल्म जगत के अलावा युवाओं खासकर छात्रों में बेहद दिलचस्पी है। और, ऐसी ही दिलचस्पी लोग एक और जमीन से जुड़ी फिल्म गैंग्स ऑफ वाशीपुर को लेकर भी दिखा रहे हैं। निर्देशक अनुराग कश्यप की इस फिल्म की प्रेरणा भले एक अंग्रेजी फिल्म ही रही हो, पर भारत की दशा और दिशा में पिछले छह दशकों में आए बदलाव को कहने के लिए जिस तरह उन्होंने एक आम गैंगवार को कहानी को सूत्रधार बनाया है, वो काफी रोचक हो सकता है। अनुराग कश्यप फिलहाल इस फिल्म के बारे में ज्यादा कुछ कहते नहीं हैं। हालांकि, इस फिल्म के निर्माण से जुड़े लोग इसे अनुराग के करियर की अब तक की सबसे महंगी और सबसे निर्णायक फिल्म बता रहे हैं। आमिर और नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्में बनाने वाले निर्देशक राजकुमार गुप्ता भले नाम कमाने के बाद अब पैसा कमाने के लिए घनचक्कर जैसी विशुद्ध मसाला कॉमेडी फिल्म बनाने की राह पर निकल गए हों, लेकिन पान सिंह तोमर के जरिए कामयाबी की नई ऊंचाई छूने वाले इरफान खान का नजरिया साफ है। वह कहते हैं, कहानी को सोचे और सीते बिना फिल्म बनाना अपने साथ बेईमानी है। और कोई भी काम बिना ईमानदारी के किया जाए तो ज्यादा दिन तक सुकून देता नहीं हैं। हम हिंदुस्तानी सदियों से भावनाओं में बहते आए हैं और ऐसे में अगर ये भावनाएं हमारे अपने बीच की हों तो हर आदमी का दिल ऐसी कहानियों के साथ हो ही लेता है।

Once There Used To Be Film Critics…

Cinematorium
Pankaj Shukla

Having stopped reviewing films on weekly basis long back, I hardly have an urge to watch each and every movie first day first show now. Friday noon or Thursday evenings used to be booked for a film in my weekly schedules for almost a decade then and no matter what, be it rain, the thunderstorms or the scorching heat, I had to be there to see a new film. Sometimes the time used to pass by with an entertaining film, sometimes it was more thoughts than entertainment that used to come to mind and sometimes it were all emotions. But to see a film and then curse the self for wasting more than two hours of life on a trash used to be a case once in a quarter. Even flop films till sometimes back had a sense and something or the other in their making had some magic to keep you intact.

Nowadays in the time of celebration of corrupts, Film reviews too have fallen in the hands of marketing people in the dailies of most of the newspapers in India. Any person who dares to judge a film by his or her gut is sure to be crucified with so called Gangs of Marketing Men. They are modern Men In Black who are out to write the new rules of journalism and their over enthusiasm to milk producers have taken a heavy toll on ethical film journalism. Last year only when I was sitting with a close friend and one of the top most film distributors of Northern India, he cursed me for not writing weekly film reviews in a time when critics not only get plasma TV, double door fridges and foreign trip tickets but also their palms are greased well. I was aghast listening this and could only feel ashamed of the fact that the person sitting across the table is making fun of a profession which I almost fell in love. It was like listening someone abuse your darling and you could do nothing.

I don’t know how much truth was in his satire, but if he is wrong then how would a critic will rate a film with one star and other one will go on to give the same film four stars or sometimes even five stars. Not long back, a producer friend of mine wanted to make a film on this film review business and approached me to write a story for the same. I advised him if he wants to make a standing in the film trade, he should keep away from this and better make films on some other topics. Thankfully, he agreed and I was saved in washing dirty clothes of my own fraternity in public. But, now it is becoming above saturation point. It is like a time when somebody needs to stand up and say, Enough.

I liked the reviews of Minty Tejpal off late who used to write in Mumbai Mirror till very recently and may be because of his being true to his heart has cost him his job. His name has vanished from the paper’s weekly film review section. All these thoughts have been occupying much space of mind since the time I came out watching film 3 They Bhai recently. I was so much in praise of its producer Rakeyesh Omprakash Mehra till the time I didn’t see this film. He gave interviews with the headlines, ‘Producers in Hindi Film Industry do not have story sense’. And, he went on record to say that was the only reason he made 3 They Bhai. The headlines seekers gave huge space to Mr. Mehra in their papers. I am certain that he learnt this art from his hero in Rang De Basanti, Aamir Khan. Shout from the top of the highest building in town like Veeru and win Basanti (the viewers). Who cares what happened when Veeru and Basanti left in the train from Ramgadh. The money spent in buying tickets is in the pocket of the producer. His job is done, the viewers can wait for their revenge till his next film. As a producer he is not going to release his next film very soon in near future and it is certain that he will not have to bear the same burnt that Akshay Kumar is still facing post his idiotic comedy Singh Is King.

Gone are the days when writing a film review was deemed as an art. People used to line up to get an admission in film appreciation course, now every Tom, Dick and Harry is a film critic. Those who don’t even heard of plot points and basics of screenplay are the most talkative film critics in any press show. People who have no knowledge of music and its beats praise a shit song like National Anthem of the country. So overawed are these reviewers that they declare even a film like Raavan, a super hit, as soon as you start reading end credits in the theatre itself. One can now count genuine film critics in the country on finger tips, who are not in awe of stars, who don’t look for complementary things, who have no issue in watching a film with their own money than to watch in a press show and feel obliged for hardly 200 bugs. But, do newspapers have space to publish their views any more. The question is Too Boo or not to boo