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Applauses Captured!

In each of us is hidden a Story teller, one who loves to open up new windows to the world, looks up beyond the horizons and dreams in the day just to mar a virgin sheet of paper with a fantastic fable. Tumbhi came up with a Short Story Writing Contest called “Somewhere Sometime” to catch hold of such beautiful birds of imagination with only one string of condition attached, i.e. the story was required to have a twist.

 

 

Each entry was individually analyzed by the jury which comprised of Kiran Khalap (author, Brand Consultant and founder of Chlorophyll Brand & Communications Consultancy); Javed Siddiqui (urdu and hindi screenwriter, dialogue writer and playwright form India, he has written over 50 storylines, screenplays and dialogues which comprises of films like DDLJ, Umraao Jaan, Taal, Pardes, Raja Hindustani and many more); and Pankaj Shukla (a film critic, a senior journalist, a book reviewer, writer, director, and a keen traveler).

Beautiful captures of visionary pieces were tracked and judges could only give some to-be-remembered-forever remarks on the entries.

The entries were judged on the basis of 4 criteria: Plot, Narrative, Language and Twist .They were looking for a perfect balance of idea and execution along with the compulsory flawless of the language used.

Although the expectations made are seldom defeated, the jury was able to make some concrete remarkes on the quality of the entries that poured in .

Following the criteria trail, the remarks are as under:

Plot: Basically considered as the idea of the story, the plan wherein all the events of the story fall in certain sequence. Some of the entries were quite surprising with their plots with good build ups and imagery. The feel was remarkable at some reading points. Some stories also came up with slight moral reflection and subtle humor which was highly admired
Narrative: what the reader sees and hears of what happens – and how he sees and hears it. The Hindi entries were almost flawless in their narration. Although a much higher level of good narrative by the use of quality dialogues was expected which was missing.
Language: The words weaving and unfolding the events in the story need to be carefully chosen in terms of their tone and elegancy. A couple of the English ones were quite poor in their use of language with the extensive usage of sms language and not-so-decent words although the Hindi stories stil scored some decent points in this respect.
Twist-in-the-tale: The surprise element in the story which changes the course of the events and takes it to a new climax, something which is not predictable by the reader. Many of the writers used GHOSTS as the only object of Twist which was kind of predictable. The twists could have been much twistier with more element of surprise in it. Because ofcourse there could be many more surprising things than ghosts alone 🙂

Tumbhi team expects the writers who participated and got a chance to run their artworks under such veterans of the writing world will surely benefit from such valuable feedback!!

100 साल सिनेमा के: तरक्की के या गिरावट के?

हम हिंदुस्तानी परंपराओं से जश्न मनाने के शौकीन लोग हैं। हमें सिर्फ खुश होने का बहाना चाहिए। ढोलताशे और नगाड़े तो बस तैयार रहते हैं बजने के लिए। इस बार जश्न सिनेमा का हो रहा है। सौ साल के हिंदुस्तानी सिनेमा का। इस जश्न के बरअक्स तमाम बातें ऐसी हैं जिन पर बातें की जा सकती हैंबहसें हो सकती हैं और गंभीर परिचर्चाएं आयोजित की जा सकती हैं। लेकिनसिनेमा की सुध ही किसे हैन सरकार को और न सरोकार को। सिनेमा वहीं फिर से पहुंचता दिख रहा हैजहां से ये चला था।

कहते हैं कि सौ साल में हर वो संस्था अपनी पूर्णगति को प्राप्त हो लेती है जिसका जरा सा भी ताल्लुक आम लोगों से रहता है। जिस सिनेमा को बाहरगांव में गरीबी, रजवाड़ों, झोपड़पट्टियों और मदारियों के खेल तमाशों से शोहरत मिली, वो हिंदुस्तानी सिनेमा अब रा वन, रोबोट और कोचादईयान की वजह से विदेश में जाना जा रहा है। पाथेर पांचाली, मेघे ढाका तारा, सुजाता, देवदास, मुगल ए आजम, मदर इंडिया का जमाना अब गया, अब सिनेमा दबंग, वांटेड, सिंघम और सिंह इज किंग हो गया है। और, ये चलन केवल हिंदी सिनेमा का ही नहीं है बल्कि हिंदी सिनेमा में ये चलन दक्षिण की उन फिल्मों से आया है, जिन्हें बनाने वालों को सिनेमा का सिर्फ एक ही मतलब समझ आता है और वो है पैसा।

पैसा एंटरटेनमेंट से आता है और सिल्क स्मिता बनीं विद्या बालन ने अभी पिछले साल ही तो समझाया था कि एंटरटेनमेंट होता क्या है? एंटरटेनमेंट का ये नया मतलब फिल्म मेकर्स ने खुद निकाला है। नहीं तो ऐसा एंटरटेनमेंट तो पहले भी बड़े परदे पर होता रहा है। दक्षिण में श्रीदेवी और कमल हासन की शुरूआती फिल्में अगर आप देख लें तो शायद कांतिलाल शाह भी शरमा जाएं। बताने वाले बताते रहे हैं कि कैसे हिंदी सिनेमा में सुपर स्टार बनने के बाद श्रीदेवी ने अपनी तमाम बी और सी  ग्रेड वाली फिल्मों के राइट्स खरीद कर उनके प्रिंट अपने कब्जे में कर लिए थे। ये बात कोई बीस-पचीस साल पहले की है, लेकिन उससे थोड़ा और पीछे जाएं तो सिनेमा में सेक्स का तड़का लगाने के लिए राज कपूर ने पहले पहल मेरा नाम जोकर में सिमी ग्रेवाल के सहारे, फिर सत्यम् शिवम् सुंदरम् में जीनत अमान के सहारे और राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी के सहारे खुलेआम कोशिशें कीं। नारी सौंदर्य के बहाने हुई इन कोशिशों को कलात्मकता की सफेद लेकिन भीगी साड़ी में ढकने की वो कोशिशें अब तक जारी हैं और साथ ही जारी है सिनेमा और मनोरंजन का वो संघर्ष जो दादा साहेब फाल्के की बनाई पहली हिंदुस्तानी फिल्म राजा हरिश्चंद्र के साथ ही शुरू हो गया था। जाहिर है दूसरे कारोबारों की तरह सिनेमा भी सिर्फ एक कला शुरू से नहीं रहा। इसे कारोबार के लिए ही रचा गया और अब तक कारोबार ही इसे रच रहा है।

सिनेमा और कारोबार के बीच एक बहुत महीन फासला रहा है। कुछ कुछ वैसा ही जैसे कि नग्नता और अश्लीलता में होता है। हिंदी समेत तमाम दूसरी भाषाओं में सिनेमा ने कुछ बेहतरीन पड़ाव पचास और साठ के दशक में पार किए। तब भी भारत का सिनेमा विदेश जाता था। सराहा जाता था और पुरस्कार भी पाता था। पर तब तक सिनेमा पथभ्रष्ट नहीं हुआ था। और तब तक सेंसर बोर्ड में ऐसे लोग भी नहीं आए थे जो कैसे इसकी ले लूं मैं, जैसे विज्ञापन तो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए पास कर देते रहे हों लेकिन फिल्म में तिब्बत के झंडे को लेकर उनका सामाजिक बोध एकदम से जाग जाता रहा हो। देखा जाए तो भारत में सिनेमा के सौ साल एक ऐसी बेतरतीब उगी फसल है, जिसे काटने वाले और अपना बताने वाले बहुत हैं, लेकिन इसका रकबा बढ़ाने की और बाकी की बंजर जमीन पर हल चलाने की कोशिश करने वाले गिनती के भी नहीं बचे हैं। अपने आसपास से कहानियां बटोरने वाला भारतीय सिनेमा कब धीरे धीरे डीवीडी सिनेमा में बदल गया, लोगों को पता तक नहीं चला।

असल कहानियों का टोटा

ब्लैक फ्राइडे, पांच, देव डी और गुलाल जैसी फिल्मों से मशहूर हुए निर्देशक अनुराग कश्यप कहते हैं, भारतीय सिनेमा की कोई एक पहचान नहीं है। हॉलीवुड फिल्मों की बात चलते ही हम कह देते हैं कि वहां सिनेमा तकनीक से चलता है। हमारे यहां तकनीक अभी उतनी सुलभ नहीं है। हर निर्माता सिर्फ तकनीक को सोचकर सिनेमा नहीं बना सकता। भारतीय सिनेमा की एक पहचान जो पिछले सौ साल में बनी है, उसमें मुझे एक बात ही समझ आती है और वो है इसकी सच्चाई। सिनेमा और सच्चाई का नाता भारतीय सिनेमा में शुरू से रहा है। बस बदलते दौर के साथ ये सच्चाई भी बदलती रही है और बदलते दौर के सिनेकार जब इस सच्चाई को परदे पर लाने की सच्ची कोशिश करते हैं, तो बवाल शुरू हो जाता है। अनुराग की फिल्मों के सहारे भारतीय सिनेमा के पिछले बीस पचीस साल के विकास को भी समझा जा सकता है। अनुराग कश्यप भले अपने संघर्ष के दिनों को पीछे छोड़ आए हों और अपनी तरह के सिनेमा की पहचान भी बना चुके हों, लेकिन उनका सिनेमा पारिवारिक मनोरंजन के उस दायरे से बाहर का सिनेमा है, जिसे देखने के लिए कभी हफ्तों पहले से तैयारियां हुआ करती थीं। एडवांस बुकिंग कराई जाती थीं और सिनेमा देखना किसी जश्न से कम नहीं होता था। अब सिनेमा किसी मॉल में शॉपिंग सरीखा हो चला है। विंडो शॉपिंग करते करते कब ग्राहक शोरूम के भीतर पहुंचकर भुगतान करने लग जाता है, खुद वो नहीं समझ पाता। जाहिर है सिनेमा बस एक और उत्पाद भर बन जाएगा तो दिक्कत होगी ही।

किसी भी देश के मनोरंजन में उसकी मिट्टी की खुशबू न हो तो बात लोगों के दिलों तक असर कर नहीं पाती है। भले दिबाकर बनर्जी जैसे लोगों को लगता हो कि हिंदुस्तान का साहित्य अब ऐसा बचा ही नहीं जिस पर सिनेमा बन सके, पर असल दिक्कत सिनेमा के साथ तकनीशियनों के आराम की भी है। काशीनाथ सिंह के मशहूर उपन्यास काशी का अस्सी पर सनी देओल जैसे सितारे के साथ फिल्म बना रहे डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी कहते हैं, सिनेमा खुद को बनाता है। हमें बस एक ऐसा कथ्य तलाशना होता है, जिसके जरिए हम दर्शकों के दिल को टटोल सकें। भारतीय सिनेमा के उत्थान और पतन जैसी ऐतिहासिक बातों में न पड़ा जाए तो भी ये तो कहा ही जा सकता है कि भारत में सिनेमा दो खांचों में बंटा दिखता है। इसमें एक सिनेमा वो है जिसमें सिर्फ टिकट खिड़की का मनोविज्ञान काम कर रहा होता है। ये सिनेमा सिर्फ टिकट खिड़की पर भीड़ जुटाने में यकीन रखता है। दूसरी तरह का सिनेमा भी टिकट खिड़की पर भीड़ तो देखना चाहता है, लेकिन उसे बनाने वाला ये भी चाहता है कि तीन घंटे सिनेमाघर में बिताने के बाद दर्शक खुद पर खीझता हुआ बाहर न निकले। मनोरंजन हो, लेकिन स्वस्थ हो, बस दूसरी तरह का सिनेमा यही चाहता है। लेकिन, इसके लिए रास्ता बहुत कठिन है और इस पर आपको अपनी सोच का हमसफर मिलेगा भी, ये आखिर तक ठीक नहीं होता। द्विवेदी की बातों में दम नजर आता है। रीमेक पर रीमेक बना रहे सिनेमा में वाकई असल कहानियां खोजने वाले  गिनती के हैं।

कहां गए वो लोग?

कहानियों के बाद सिनेमा के सौ साला जश्न के दौरान अगली बात निकलती है निर्देशन की। ऐसा क्यूं कर है कि अजीज मिर्जा, श्याम बेनेगल, रमन कुमार, बी आर इशारा और सागर सरहदी जैसे फिल्म निर्देशकों को इन दिनों पहले फिल्में बनाने के लिए और फिर बन जाने पर उन्हें बेचने के लिए सौ जगह सिर पटकने पड़ रहे हैं। सागर सरहदी की फिल्म चौसर लिखने वाले राम जनम पाठक कहते हैं, सिनेमा अब मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को टटोलने का माध्यम नहीं रह गया है। ये माध्यम अब सिद्दीक जैसे लोगों का है जो एक ही फिल्म को अलग अलग तड़का लगाकर अलग अलग भाषाओं में बनाते रहते हैं। पाठक मानते हैं कि सिनेमा की सामाजिक सोच अकाल मृत्यु का शिकार हो चुकी है और अब यहां सिर्फ वही तीर मार सकता है जिसकी जेब में पैसा हो और जिसके निशाने पर भी बस पैसा ही हो। पैसे का बोलबाला सिनेमा में हमेशा से रहा है पर सिनेमा में भी नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतिकार ही किया है। मशहूर निर्देशक जहानु बरूआ के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे पटकथा लेखक निलय उपाध्याय कहते हैं, सिनेमा के सौ साल का सबक यही है कि यहां हुनर के बजाय तिजोरी का सम्मान होने लगा है। भारतीय सिनेमा खासकर हिंदी सिनेमा एक ऐसी अंधी सड़क पर रफ्तार लगा चुका है, जिसके मोड़ों और मंजिल के बारे में उसे खुद नहीं पता। सिनेमा अब सिनेमा रहा ही नहीं, वह खालिस मनोरंजन का बाजार बन चुका है। एक ऐसा बाजार जहां एक रुपये लगाकर सौ रुपये कमाने का जुआ खेला जा रहा है और जिसकी फड़ पर फेंके जा रहे पत्तों में हर बार तीन इक्के निकलने ही निकलने जरूरी हैं। ऐसे में ये तीनों इक्के किसके पास निकलेंगे जाहिर है ये पहले से तय होता है। भारतीय सिनेमा की अब विदेशी फिल्म समारोहों में बात होती है तो या तो किसी वाद विवाद के चलते या फिर देह के दर्शन के चलते। अब न लोगों को गुरुदत्त याद रहे, ना के आसिफ। यहां तक कि मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और रमेश सिप्पी तक लोगों को बीते जमाने की बातें लगने लगे हैं।

शो जस्ट गोज ऑन

सौ साल के सिनेमा के सफर में अगर दक्षिण के नामचीन कलाकारों में एन टी रामाराव, राजकुमार, जय ललिता जैसे दर्जनों सितारों के नाम लगातार आते हैं तो पश्चिम और पूरब के सितारों में ये गिनती कलाकारों की कम और सितारों की ज्यादा होती है। इस मामले में सिनेमा के साथ चारों दिशाओं में एक हादसा एक सा हुआ और वह है नए कलाकारों का सिनेमा में प्रवेश करीब करीब बंद हो जाना। सिनेमा अब करोड़ों का हो चला है और पिछले बीस साल में एक भी निर्माता ने करोड़ों का दांव किसी ऐसे लड़के पर नहीं खेला है जिससे उसका दूर दूर का कोई नाता तक न हो। हिंदी सिनेमा का आखिरी सुपर स्टार रणवीर कपूर जिस खानदान से है वो तो सबको पता ही है, उनसे पहले जो सुपर सितारा 2001 में बड़े परदे पर नमूदार हुआ वो ऋतिक रोशन भी फिल्मी परिवार का ही है। सिनेमा को नजदीक से जानने वालों को भी अब समझ में आता है कि अब सिनेमा नहीं बस प्रोजेक्ट बनते हैं। हर निर्देशक किसी न किसी सितारे को पकड़ने की जुगाड़ में कई कई साल गुजार देता है। अशोक कुमार, पृथ्वीराज कपूर आदि के जमाने के बाद भले पहले राज कपूर, देव आनंद, दिलीप कुमार, फिर अमिताभ बच्चन, राजेश खन्नाा, ध्ार्मेंद्र, विनोद खन्नाा, राजेंद्र कुमार और मिथुन चक्रवर्ती तक आते आते सिनेमा में अपने बूते कुछ बन दिखाने या कर सुनाने वालों की गिनती कम होती रही हो, पर तय ये भी रहा कि सिनेमा ने नए का स्वागत करना बंद नहीं किया। लेकिन, तीसेक साल पहले मिथुन चक्रवर्ती के सुपर स्टार बनने के बाद से फुटपाथ पर फाकाकशी करने वाले किसी आम इंसान ने रुपहले परदे  पर शोहरत का सबसे ऊंचा शिखर नहीं पाया। और, हिंदुस्तानी सिनेमा की पतन गाथा की शुरूआत भी बस वहीं से शुरू होती है।

तकनीक का उनवान

राजेंद्र कुमार की गोरा और काला, दिलीप कुमार की राम और श्याम, हेमा मालिनी की सीता और गीता से लेकर शाहरूख खान की ओम शांति ओम तक आते आते डबल रोल को ही सिनेमा की बेहतरीन तकनीक समझने वालों के नजरिए में भी कुछ ऐसा बदलाव आया है कि अब रा वन में अर्जुन रामपाल को एक ही फ्रेम में दस दस अवतारों में देखकर भी लोगों को अचंभा नहीं होता। दशावतारम व रोबोट के बाद अगली बारी विश्वरूपम् और कोचादईयान की है लेकिन मशहूर सिनेमैटोग्राफर विजय अरोरा कहते हैं कि हिंदुस्तानी सिनेमा में भावनाएं हमेशा तकनीक पर बाजी मारती रहेंगी। देश का आम दर्शक तीन घंटे के लिए जब सिनेमाघर में घुसता है तो कहीं न कहीं उसकी पीठ पर पसीने की कुछ बूंदें टिकी रह ही जाती हैं। परदेस में सिनेमा देखने आने वाले ज्यादातर लोग महंगी कारों से आते हैं, अपने यहां अब भी मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने वाले ज्यादातर लोग ऑटो रिक्शा से आते हैं। बस सिनेमा का असल फर्क यहीं है। सिर्फ महंगे हॉलों में सिनेमा देखने भर से सिनेमा की परंपरा नहीं बदलती। सिनेमा की परंपरा इसे देखने वालों के जीवन में होने वाले बदलावों से बदलती है।

सूख रही संगीत सरिता

भारतीय सिनेमा की विदेश में एक बड़ी पहचान इसके संगीत की वजह से ही रही है। दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाले देश भारत में तकरीबन हर फिल्म में संगीत को तवज्जो दी जाती है और गाने इसकी पहचान रहते हैं। पर, अब ये संगीत सरिता अपने गोमुख में ही सूख रही है। मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के प्यारे लाल कहते हैं, भारतीय सिनेमा ने पिछले बीस तीस साल में सबसे ज्यादा पतन अगर किसी विभाग में देखा है तो वो संगीत ही है। नए संगीतकारों में इन दिनों बस कुछ ऐसा कर देने की होड़ लगी है जो उनके गाने के मुखड़े को लोगों की जुबान पर चढ़ा दे या फिर जिसकी बीट्स पर कम कपड़ों वाली लड़कियां डिस्कोथेक में ठुमके लगा दें। धिक्कार है ऐसी तुकबंदियों पर जिसे लोग संगीत के नाम पर बेच रहे हैं। मैं मानता हूं कि संगीत को सबसे ज्यादा नुकसान पायरेसी ने पहुंचाया है, लेकिन ये भी संगीत कंपनियों का बस एक बहाना है। जितना पैसा पहले संगीत कंपनियां सीडी या कैसेट बेचकर नहीं कमा पाती थीं, उससे कहीं ज्यादा पैसा वो कॉलर ट्यून्स बेचकर कमा रही हैं, बस नीयत बदल गई है। सिने संगीत के स्वर्णिम काल की याद दिलाने पर प्यारे लाल कहते हैं, वो जमाना ही कुछ और था। सौ लोगों का आर्केस्ट्रा अगर किसी स्टूडियो में नहीं आ पाता था तो हम लोग रात में किसी पार्क में जाकर रिकॉर्डिंग कर लिया करते थे। पर अब ना वो हरियाली बची है, ना रातों का सन्नााटा और ना लोगों में संगीत का वो जुनून। हर कोई जल्दी में हैं। हर किसी को शॉर्टकट पता हो गए हैं। लेकिन सिनेमा का तिलिस्म शॉर्ट कट से नहीं उपजता, इसके लिए लंबी और थका देने वाली मेहनत करनी ही होती है।

यारों सब दुआ करो…

अरसा हो गया अनुभव सिन्हा से बात किए हुए। हमारी आखिरी बातचीत तब हुई थी जब उन्होंने मुझे एक संभावित फिल्म निर्माता समझ कर फोन किया था और उन्हें लगा था कि मैं दिल्ली से बहुत सारा पैसा लेकर मुंबई पहुंचा हूं फिल्म बनाने। उन दिनों मैंने अपनी पहली फीचर फिल्म का काम बस शुरू ही किया था। अपनी फिल्म कैश के नाकाम रहने के बाद तब अनुभव सिन्हा काम तलाश रहे थे।

सिनेमांजलि
पंकज शुक्ल

पूरा देश जहां एक तरफ क्रिकेट वर्ल्ड कप के खुमार में डूबा हुआ है, सुनते हैं कि शाहरुख खान ने अपनी लंबे समय से बन रही और जल्द रिलीज होने जा रही फिल्म रा वन का पहला प्रोमो रिलीज कर दिया है। और, ये संयोग ही है कि ठीक इसी समय कार्टून नेटवर्क ने अपना न्यू जेनरेशन सर्वे भी इस साल के लिए रिलीज किया। पश्चिमी देशों में फिल्म और कार्यक्रम निर्माता अपने हर प्रोजेक्ट से पहले इस तरह के सर्वे कराते हैं और संभवत: कार्टून नेटवर्क ने अपनी भावी कार्यक्रम योजनाओं के मद्देनजर ऐसा किया। सर्वे के तमाम दिलचस्प नतीजों में एक नतीजा ये भी सामने आया कि भारतीय अभिनेताओं की बात चलने पर बच्चों के बीच शाहरुख खान अब भी सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। सर्वे में शामिल बच्चों में से 28 फीसदी ने शाहरुख को अपनी पहली पसंद बताया। सलमान खान उनके बाद नंबर दो पर और ऋतिक रोशन नंबर तीन पर रहे। हालिया प्रसारित हुए रिएल्टी शो जोर का झटका के आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो शाहरुख का तिलिस्म छोटे परदे पर कम होता जा रहा है, लेकिन इसकी बड़ी वजह उनका इन दिनों अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान ऐसी भाषा का प्रयोग करना माना जाता रहा है, जो भारतीय परिवार एक साथ बैठकर सुन और देख नहीं सकते। लेकिन, भले बड़ों के लिए ये भाषा अभद्र रहे, टीन एजर्स इसे ट्रेंडी मानते हैं। रा वन शाहरुख का ड्रीम प्रोजेक्ट है और इस पर वह पानी की तरह पैसा बहा भी रहे हैं। लेकिन, इस फिल्म मेरी दिलचस्पी सिर्फ इसलिए ही नहीं है कि देखें तो भला कि इसी कहानी पर पहले ही बन चुकी रोबोट से ये फिल्म कितना अलग रहती है बल्कि मैं इसका इंतजार इसके निर्देशक अनुभव सिन्हा की वजह से कर रहा हूं।

अरसा हो गया अनुभव सिन्हा से बात किए हुए। हमारी आखिरी बातचीत तब हुई थी जब उन्होंने मुझे एक संभावित फिल्म निर्माता समझ कर फोन किया था और उन्हें लगा था कि मैं दिल्ली से बहुत सारा पैसा लेकर मुंबई पहुंचा हूं फिल्म बनाने। उन दिनों मैंने अपनी पहली फीचर फिल्म का काम बस शुरू ही किया था। अपनी फिल्म कैश के नाकाम रहने के बाद तब अनुभव सिन्हा काम तलाश रहे थे। मैंने उन्हें समझाया कि मैं इस प्रोजेक्ट से बस एक निर्देशक की हैसियत से ही जुड़ा हूं और जिस किसी ने भी मेरे फिल्म निर्माता होने की सूचना उन तक पहुंचाई है, उसके पास गलत जानकारी रही है। उसके बाद उनका दोबारा फोन नहीं आया, और मैं भी जिंदगी के दूसरे झंझावातों से जूझने में लगा रहा। लेकिन, मुझे वे दिन अब भी याद हैं जब अनुभव सिन्हा मुझे अक्सर फोन किया करते थे और फोन उठाते ही पूछते थे कि क्या वह मुझसे बात कर सकते हैं? और क्या बातचीत के लिए वह सही समय है। ये वो वक्त था जब वो म्यूजिक वीडियो डायरेक्टर से फिल्म डायरेक्टर बनने की तरह पहली छलांग लगा चुके थे। आपको शायद मालूम ही होगा कि सोनू निगम के शुरुआती अलबमों के ज्यादातर वीडियो अनुभव सिन्हा ने ही निर्देशित किए हैं और ये अनुभव सिन्हा ही थे जिन्होंने शायद पहली बार अपने म्यूजिक वीडियो में बिपाशा बसु को ग्लैमर की दुनिया का पहला बड़ा मौका दिया था। अनुभव सिन्हा की दूसरी फिल्म आपको पहले भी कहीं देखा है, बुरी तरह फ्लॉप रही। ये फिल्म मैंने दिल्ली के कनॉट प्लेस के एक थिएटर में देखी थी। फिल्म देखने के बाद मैंने अनुभव को फोन किया और बताया कि फिल्म के संपादन की शैली मुझे काफी पसंद आई और ये भी कि उनका कहानी कहने का अंदाज बजाय एक रूमानी फिल्म के किसी थ्रिलर के लिए ज्यादा मुफीद है।

अनुभव ने उसके बाद कभी कोई रूमानी फिल्म नहीं बनाई। उनकी अगली दो फिल्में थी दस और कैश। इन फिल्मों के बाद वह बतौर निर्देशक बड़े परदे पर वापसी के लिए लंबा इंतजार कर चुके हैं। सिनेमा में संघर्ष के दिन ज्यादातर तकनीशियनों को जिंदगी की हकीकत से रूबरू कराते हैं। मुझे उम्मीद है कि ऐसा ही कुछ सबक अनुभव ने भी अपने इस संघर्ष से सीखा होगा और वह अब भी रा वन की टीम के कप्तान की हैसियत से अपने एक बड़े सपने को परदे पर उतारने में तल्लीन होंगे। अनुभव में फिल्म बनाने के सबसे अहम पहलू शॉट डिवीजन के दौरान नए नए प्रयोग करने की अद्भुत क्षमता है। वह एक मंजे हुए तकनीशियन और एक उम्दा निर्देशक हैं हालांकि यही बात उनकी निजी शख्सीयत के बारे में मैं दावे के साथ नहीं कह सकता। ग्लैमर की दुनिया की चकाचौंध के अलावा इस जिंदगी का एक दूसरा पहलू भी है, जो उतना आकर्षक अक्सर नहीं दिखता। अनुभव ने मुंबई आकर जिन दोस्तों का गुट बनाया था, वह अब बिखर चुका है। उन पर फ्लॉप निर्देशक का तमगा चस्पा होने के बाद वे सारे दोस्त उनसे कन्नी काटकर निकल चुके हैं। शायद अनुभव और शाहरुख दोनों का दिल्ली कनेक्शन उन्हें रा वन के करीब लाया। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान अक्सर हमें तरह तरह के किस्से सुनने को मिलते रहे हैं कि कैसे हर शॉट के बाद अनुभव ओके कहने से पहले शाहरुख का मुंह ताकते हैं। लेकिन मेरा अपना मानना है कि अगर ऐसा होता भी रहा है तो शाहरुख का बतौर निर्माता इसका हक बनता है। रा वन की मेकिंग से जुड़े मित्र बताते रहे हैं कि ये फिल्म हिंदी सिनेमा निर्माण में एक नया अध्याय जोड़ सकती है। ये फिल्म दुनिया की बेहतरीन फिल्मों का मुकाबला करने में सक्षम है। हालांकि, मैंने रा वन का फर्स्ट लुक प्रोमो अभी तक नहीं देखा है, फिर भी मुझे यकीन है शाहरुख जैसे सुपर स्टार और अनुभव जैसे काबिल हुनरमंद ने मिलकर जरूर एक ऐसी फिल्म बनाई होगी जो अनुभव के शुभचिंतकों और शाहरुख के प्रशंसकों को समान रूप से पसंद आएगी।